prembrij.

पंजाब आतंकवाद - आंखों देखा सच

मेरी मां बहुत ही परोपकारी, सरल स्वभाव वाली एवं मिलनसार थी। हर एक के सुख दुख में हमेशा शरीक होती ।मेरे पिता बहुत छोटी उम्र में नहीं रहे ।  इसलिए मुझे कभी भी पिता के सानिध्य में होने की  अनुभव नहीं हो पाया ।मेरे बड़े भाइयों ने भी कभी पिता के बारे में मुझे जिक्र नहीं किया। मेरे बाल सुलभ मन में कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े शायद मेरी मां ने मेरे बड़े भाई बहनों को उनके बारे में ज्यादा बात करने के लिए मना कर दिया होगा ।   मेरी मां ने प्रतिकूल परिस्थितियों में हम सभी लोगों का लालन पालन किया। हम एक बड़े शहर की व्यस्त गली की बिल्डिंग में रहते थे, जिसमें लगभग 40 से 50 किराएदार थे।  हम इतने संपन्न नहीं थे लेकिन मैंने देखा  कि लोग  मेरी मां का बहुत ही आदर करते थे।  बचपन से ही  यह बात अंदर तक घर कर गई थी की जो व्यक्ति समाज के काम  आता है उसे हमेशा सम्मान मिलता है। ईश्वरीय कृपा एवं  मां-बाप के संस्कार के कारण ही ऐसे गुण उत्पन्न होते हैं । मैं भी यदा कदा ऐसे कामों में अक्सर मां के साथ भाग लेता था। 60 के दशक में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने के कारण पूरे देश में रोष व्याप्त था। हमारे शहर में भीड़ की भीड़ चीनी रेस्टोरेंट और दांतों के क्लीनिक जो अधिकतर चीनी लोगों द्वारा चलाए जाते थे भीड़ उन पर हमला कर रही थी। मैं काफी छोटा था,मुझे इतनी समझ नहीं थी फिर भी मैं उस भीड़ का एक हिस्सा था।हवाई हमले का सायरन बजते ही उन दिनों पूरे शहर में ब्लैक आउट हो जाता था। छोटे-छोटे झुंड में लोग  गलियों में जहां कहीं भी रोशनी आ रही होती थी उसे बंद करवाने के लिए  निकल पड़ते थे। कई बार हम लोग रात रात भर ऐसा करते थे। 1971 पाकिस्तानी आक्रमण के समय वालंटियर के रूप में कार्य करने पर प्राप्त प्रशस्ति पत्रउस समय सोशल मीडिया या कोई अन्य साधन नहीं थे ।विविध भारती में सारा दिन लोगों में  जोश भरने के लिए देशभक्ति के गीत 24 घंटे रेडियो में  बजते थे।रेलवे स्टेशन और रोड में सैनिकों को ले जाने वाली गाड़ियों में मैं फूड पैकेट और पानी इत्यादि देने वाली भीड़ में होता था और घंटों खड़े होकर फौजियों का इंतजार करता था और तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाता।1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान मैं विभिन्न संस्थाओं जैसे "नागरिक सुरक्षा समिति "का अहम हिस्सा बना और वालंटियर के रूप में कार्य किया।अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद मैं पंजाब में  नौकरी के लिए चला गया। पंजाब में 1973 से लेकर 2003 तक रहा। 1980 तक मैंने पंजाब का  स्वर्णिम युग देखा.उस समय पंजाब भारत के समृद्ध प्रदेश के रूप में जाना जाता था।सिख लोग  बहुत ही शरीफ और ईमानदार किस्म के लोग होते हैं। उन दिनों पंजाब भारत के अपराध मुक्त प्रदेशों में एक था। हत्या, बलात्कार, चोरी या डकैती जैसी घटनाएं मैंने  पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत के पहले तक कहीं भी नहीं देखा या सुना।लेकिन दुर्भाग्य वश 1979 में  निहंग सिखों की ‘दमदमी टकसाल’  एवं ‘निरंकारी’ नाम की  धार्मिक संस्थाओं में धार्मिक कटुता और मतभेद होने की वजह से  खूनी संघर्ष हुआ जिसने  पूरे पंजाब का माहौल खराब कर दिया। निरंकारी संस्था में सिख और गैर सिख दोनों समुदाय के लोग थे और दमदमी टकसाल निहंग सिखों की कट्टर धार्मिक संस्था थी।इस घटना के बाद में निहंगों द्वारा टारगेट करके निरंकारियों को पूरे पंजाब में मारा गया।संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की अगुवाई में पूरे पंजाब में गोल्डन टेंपल सहित सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों में निहंग सिखों द्वारा कब्जा कर लिया गया, और पूरे प्रदेश में आतंकवादियों द्वारा समानांतर सरकार चलाई जाने लगी। सरकारी अधिकारियों एवं समर्थकों की हत्या होने लगी ।अराजक तत्वों के शामिल होने के बाद टारगेट करके हिंदुओं और माइग्रेंट लेबर को मारा जाने लगा ।उनका उद्देश्य पंजाब की अर्थव्यवस्था को चौपट करना था, तथा पूरे प्रदेश में  खालिस्तान की स्थापना का लक्ष्य रखा गया।  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश से पूरा पंजाब सेना के हवाले कर दिया गया और ऑपरेशन ब्लू स्टार के अंतर्गत लगभग 500 उग्रवादियों सहित संत जरनल सिंह भिंडरावाले को मारा गयाI इस पूरे ऑपरेशन में लगभग 100 भारतीय सैनिकों की भी शहादत हुई । क्योंकि स्वर्ण मंदिर में जाने का रास्ता कहीं से भी नहीं था । सेना धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए नंगे पैर अंडरग्राउंड सीवर और पानी की लाइन से होकर स्वर्ण मंदिर में प्रवेश किया था।बड़े-बड़े  रॉकेट लांचर तक का प्रयोग करके स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया था । इस कार्यवाही से सिखों की धार्मिक भावनाएं बहुत आहत हुई और इससे आम सिखों में बहुत रोष व्याप्त हो गया । लोगों के बीच में धार्मिक भावनाएं भड़काई गई, परिणाम स्वरूप श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या उनके  निवास स्थान में उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा की गई।उन दिनों मैं  हरियाणा बॉर्डर के पास स्थित पंजाब के एक इंडस्ट्रियल एरिया में असिस्टेंट मैनेजर के तौर पर कार्य कर रहा था।इंदिरा गांधी की हत्या और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद  मैंने देखा कि लोगों में हिंदुओं के प्रति घृणा पैदा होने लगी थी। सिख राजनीतिक दल जो सत्ता के बाहर थे वह आग में घी डालने का काम कर रहे थे इसलिए बहुत बड़ी संख्या में भूतपूर्व सैनिक यहां तक सेना में भी सिख रेजीमेंट में बगावत हो चुकी थी। मैं जिस मकान में किराए में रहता था, मेरे साथ ही एक रिटायर्ड सूबेदार रहते थे। रात में सपरिवार मित्रों के साथ शराब पीना एक आम बात थी। प्रत्येक समारोह में तो यह लगभग अनिवार्य था। मेरा कमरा उनके साथ ही लगता था और खिड़की भी दोनों कमरों की एक थी जो बंद रहती थी।रात को सूबेदार साहब की शराब पार्टी में मैंने एक दिन संत जरनैल सिंह भिंडरावाला की कैसेट को ध्यान लगाकर खिड़की से सुना जो हिंदुओं के प्रति घृणा और रोष भड़काने और प्रतिशोध लेने से संबंधित होता था। ऐसे कैसेट मैं रोज सुन सुनकर थोड़ा सा भयभीत भी होता था। बाद में  मैंने वह मकान छोड़ दिया । पंजाब की फैक्ट्री में  लगभग 70% बाहर के प्रवासी मजदूर या स्टाफ होता था और 30 प्रतिशत लोकल सिख कर्मचारी कार्य करते थे। 1985 के बाद आतंकवाद का एक नया रूप पूरे पंजाब में फैल रहा था। काफी बड़ी संख्या में सिख निहंग बन रहे थे। निहंग बनने वाले अधिकतर लोग कम पढ़े-लिखे एवं  कट्टर सिख थे । निहंग सिख आम तौर पर अपने डेरे में ही रहते थे कभी भी सार्वजनिक रूप में ज्यादा नजर नहीं आते थे ।उन दिनों उनकी संख्या काफी बढ़ गई थी जो सड़कों और बाजारों में झुंड के झुंड लंबी तलवारों और ऊंचे भालों के साथ घूमती हुई नजर आती थी जिसको देखकर हिंदुओं में भय व्याप्त हो जाता था और लोग इधर-उधर भाग के खड़े हो जाते थे। मैं  प्रतिदिन फैक्ट्री से घर आने के बाद  केवल सब्जी इत्यादि लेने के लिए  शाम के समय बाजार अवश्य जाता था ।ज्यादातर फैक्ट्री में प्रबंधक अप्रवासी होने के कारण सिखों के साथ भेदभाव करते थे। शायद यह मेरा स्वभाव था या संस्कार मैंने अपनी फैक्ट्री में कभी भी है प्रवासी मजदूर और लोकल सिखों के बीच में भेदभाव नहीं किया।काफी सिख मेरे मित्र थे और सिख मजदूर भी  मेरे काफी विश्वास पात्र थे। हमारी फैक्ट्री के कुछ मजदूर भी निहंग सिख बन गए थे ।फैक्ट्री में आने के बाद में वह  निहंग की वेशभूषा बदलकर फैक्ट्री ड्रेस में कार्य करते थे  और जाते समय निहंग की वेशभूषा पहन कर बाहर निकल जाते थे।1 दिन  मैं मार्केट में सब्जी ले रहा था। निहंग के एक झुंड को देखकर मार्केट में थोड़ी सी हलचल मची । देखते-देखते मार्केट में सन्नाटा छा गया मैं और मेरे साथ कुछ लोग खड़े रह गए। “बाबू साहब, सत श्री अकाल” निहंग के उस झुंड से एक आवाज आई और एक निहंग ने आगे बढ़कर मुझे हाथ जोड़कर अभिवादन किया ।मैंने ध्यान से देखा वह मेरी फैक्ट्री में काम करने वाला मेरा विश्वास पात्र मीना सिंह था। “बाबूजी गुरुद्वारा जा रहा था, आपको देखकर इधर मुड़ आयाI कोई दिक्कत हो तो बताना’” और वह मुझे दोबारा अभिवादन करके पूरे दल के साथ वापस चला गया। मैंने देखा मैं जब भी मार्केट में जाता था तो कुछ सब्जी वाले मुझे हमेशा कहते “बाबूजी जो लेना हो ले लो, आपसे  क्या मोल भाव करना ।“ मैं समझ गया था कि निहंगों की वजह से यह लोग मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं। लेकिन इस स्थिति को मैं देखकर अंदर से परेशान अवश्य था ।यह कुछ अच्छा नहीं हो रहा था।1987 में मैं पटियाला से 70 किलोमीटर दूर एक इंडस्ट्रियल एरिया में प्रबंधक के तौर में पदोन्नति होकर नई फैक्ट्री में कार्यभार ग्रहण किया। मेरे  इस कंपनी के निहंग कर्मचारी और अन्य विश्वासपात्र सिख मेरे ट्रक के साथ नई कंपनी के आवास  में सामान के साथ छोड़ने आए और उन्होंने मेरे सारे सामान को व्यवस्थित करने के बाद मुझे विदा होते समय कहा " बाबूजी जब तक आप पंजाब में हो, आप चिंता ना करना। यह जो भी हो रहा है यह आप जैसे लोगों के लिए नहीं ।आप तो बहुत  व्यावहारिक और समाजसेवी हैं ।आपको यहां कोई भी कष्ट नहीं होगा।“ उसके बाद में भी मीना सिंह जब तक मैं पंजाब में रहा वह मेरे संपर्क में हमेशा रहा।मैं नई जगह पर 1987 से लेकर 2000 तक रहा। मैं यहां पर स्थाई रूप से निवास स्थान बनाकर बस गया था। धार्मिक अवसरों पर मंदिर और गुरुद्वारों में लंगर और अन्य सेवाओं में भी हिस्सा लेता था। स्थानीय लोगों से संपर्क होने के बाद  मैं लायंस क्लब इंटरनेशनल, रेड क्रॉस जैसी विश्व विख्यात संस्थाओं से भी जुड़ गया। मैं लायंस क्लब जिला 321F की मेंबरशिप लेने के बाद में  इस संस्था के साथ लगभग डेढ़ दशक तक कार्य किया। मैं लायंस क्लब का सेक्रेटरी एवं प्रेसिडेंट भी बना, जो मेरे लिए गौरव की बात थी। तत्कालीन चीफ मिनिस्टर श्री हरजीत सिंह बराड़, तत्कालीन कांग्रेस चीफ  श्रीमती राजेंद्र कौर भट्ठल, अन्य गण मान्य जो समय-समय पर लायंस क्लब में लगने वाले कैंपों में मुख्य अतिथ के रूप में आए थे, (see clockwise) लायंस क्लब Distt321F के प्रेसिडेंट के तौर पर  भाषण एवं प्राप्त सम्मान पत्रमैंने आसपास के गांव में सैकड़ो की संख्या में ब्लड डोनेशन कैंप, आई कैंप ,मेडिकल चेकअप कैंप  सहित अनेक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लिया। मुझे स्थानीय एवं आसपास के गांव में बहुत बड़ी संख्या में लोग पहचानते थे।इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी द्वारा पंजाब में कट्टरपंथी राजनीतिक दल से संविधान के अंतर्गत मांगे मानकर समझौता किया गया, जिसे  राजीव -लोंगोवाल समझौता का नाम दिया गया। राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने के कारण लोंगोवाल की हत्या कर दी गई ।पंजाब का उग्रवादी धड़ा इसका विरोध कर रहा था जिसके कारण आगे चलकर पंजाब  में आतंकवाद फैला। लोंगवाल गांव हमारे कस्बे के पास था इसलिए आतंकवादी घटनाएं हमारे कस्बे के आसपास काफी तेजी से घटने लगी। अमृतसर में पंजाब के सीमावर्ती इलाके में बस से उतार कर बहुत बड़ी संख्या में गैर सिखों का नरसंहार किया गया। सूर्यास्त होने से बाद  पूरे प्रदेश में हर प्रकार के वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध लग गया। मेरे स्थानीय मित्र हर प्रकार से सहयोग देने का भरोसा देते थे। लोगों से पहचान ,धर्म और प्रदेश का नाम पूछ कर के हत्याएं की जा रही थी। जिन लोगों की दाढ़ी बढ़ी हुई थी और पंजाबी बोल लेते थे उन लोगों ने अपनी पहचान छुपाने के लिए पगड़ियां पहन ली थी।  मैं पंजाबी बोल लेता था थोड़ी बहुत लेकिन मैं पंजाबी पूरी समझता  था।  सभी फैक्ट्रियों के प्रबंधकों के पास में खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट की ओर से धमकी भरे पत्र आ रहे थे।एक दिन ऐसा ही पत्र मुझे प्राप्त हुआ। दूसरे दिन चेंबर ऑफ कॉमर्स की  मीटिंग में सभी मिल मालिकों एवं प्रबंधकों की मीटिंग हुई। मिल मालिकों द्वारा हर प्रकार की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। हमारे कस्बे के कुछ फैक्ट्री के प्रबंधक जो मेरे मित्र थे उन्होंने रातों-रात बगैर वेतन लिए फैक्ट्री को छोड़ दिया।सबसे ज्यादा मै चिंतित था क्योंकि मेरे बच्चे चंडीगढ़ में पढ़ रहे थे।मैंने स्थाई निवास स्थान बना लिया था। इसके अलावा मेरा कोई पैतृक घर भी नहीं था। हमारी फैक्ट्री के स्थानीय लोग काफी बड़ी संख्या  मेरे समाज सेवी संस्थाओं में जुड़े होने के कारण जो मैं सामाजिक कार्यों को आसपास के गांव में करता था वे लोग मुझे अत्यंत सम्मान देते थे और फैक्ट्री में भी वह मेरे साथ पूरा सहयोग करते थे ।आसपास के गांव में हत्याएं होने या कोई अप्रिय घटना होने पर वह मुझे आकर सुरक्षा का भरोसा देते थे।मुझे जो धमकी पत्र मिला था मैंने उसकी चर्चा किसी से नहीं की। लेकिन तीन-चार दिन इंतजार करने के बाद आतंकवादियों के द्वारा भेजा हुआ वह धमकी पत्र मैं अपनी फैक्ट्री के सिक्योरिटी ऑफिसर धन्ना सिंह जो एक रिटायर्ड आर्मी सूबेदार और स्थानीय निवासी थे उनको दिखाया। उन्होंने पत्र देखकर बताया कि यह पत्र मुझे नकली लग रहा है क्योंकि   गुरुद्वारों , ग्राम पंचायतों और स्थानीय फैक्ट्री मालिकों और प्रबंधकों को जो भी पत्र आ रहे हैं वह गुरुमुखी में और  खालिस्तान कमांडो फोर्स के लेटर हेड में होते हैं।  उन्होंने मुझसे  धमकी पत्र लेते हुए आश्वासन दिया कि वह इस पत्र की विश्वसनीयता का पता लगाएंगे । 2 दिन बाद उन्होंने बताया कि मुझे जानबूझकर परेशान करने के लिए किसी ट्रेड यूनियन के नेताओं द्वारा भेजा गया था । उन्होंने मुझे असली धमकी पत्र की एक प्रति दिखाई जिसमें आतंकवादियों द्वारा कुछ दिशा निर्देश दिए थे।प्रदेश में  प्रजातांत्रिक सरकार होते हुए भी पूरे पंजाब में आतंकवादियों द्वारा समानांतर सरकार चलाई जा रही थी। स्कूल और कॉलेज की ड्रेस कोड आतंकवादियों द्वारा बदल दी गई थी। पंजाब केसरी वहां का प्रमुख समाचार पत्र था जिसमें पंजाब में हो रहेआतंकवाद की आलोचना होती थी साथ ही पूरे पंजाब में आतंकवादी गतिविधियों की रिपोर्ट छपती थी। उस समाचार पत्र के संस्थापक लाला जगत नारायण की आतंकवादियों  ने गोली मार कर हत्या कर दी थी और समाचार पत्र पर आतंकवादियों द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। मुझे साहित्यिक अभिरुचि होने के कारण मेरी कुछ रचनाएं भी अदा कदा वहां छपती रहती थी, साथ ही हमारे लायंस क्लब की गतिविधियां और प्रोग्राम  भी उसमें छपते थे  जिसके कारण वह पेपर में मंगवाता था।  स्थानीय हाकर  मेरा परिचित था और जिसको भी आवश्यकता होती थी पंजाब केसरी सुबह चुपचाप पहुंचाता था।एक दिन हमारे निवास स्थान के कुछ दूरी पर उसकी  गोली मारकर हत्या कर दी गई।मैं अंदर से काफी डरा हुआ था। इंडस्ट्रियल एरिया की एक पेस्टिसाइड फैक्ट्री में सिद्दीकी साहब जनरल मैनेजर मेरे घनिष्ठ मित्र थे । एकदिन मैं रात को उनके घर औपचारिकता वश चला गया। उन्होंने मुझे आतंकवादियों द्वारा प्राप्त धमकी पत्र की एक प्रति मुझे दिखाई। मैं अंदर से काफी घबरा गया क्योंकि उनका धमकी पत्र बिल्कुल ऐसा ही था जैसे धमकी पत्र की मूल प्रति को मैंने देखा था। मेरा स्थानीय लोगों के साथ जुड़ाव एवं प्रभाव को देखते हुए मेरे मित्र ने मुझ से किसी सिख ड्राइवर एवं एक ट्रक की व्यवस्था करने का अनुरोध किया,  ताकि वह रात के अंधेरे में बगैर किसी को बताए हुए अपनी फैमिली को पंजाब से शिफ्ट कर सके जो उन्हें हरियाणा पंजाब बॉर्डर तक छोड़कर आ जाए।मैंने व्यवस्था कर दी। दूसरे दिन रात को लगभग 1:00 बजे चुपचाप सपरिवार वह पलायन कर गए।  डर के मारे उन्होंने कभी भी मुझसे संपर्क नहीं किया। शायद सारे फोन नंबर उन्होंने बदल दिए होंगे।सरकार भी अपने स्तर पर पूरे प्रयास कर रही थी ।स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस का प्रभाव कम होता जा रहा था।अब पाकिस्तान की सीमा से लगे हुए शहरों और गांवों में आतंकवादियो को ऑपरेशन ब्लू स्टार के  के बाद उपजे रोष के कारण  जन समर्थन भी मिल रहा था।पूरे पंजाब को सेना अपने अधिकार में लेकर ऑपरेशन थंडर चला कर आतंकवादियों का सफाया कर रही थीहम लोग अपने घर  शाम होने से पूर्व पहुंच जाते थे । यह 1989- 90 की बात है, जिंदगी धीरे-धीरे डर डर कर चल रही थी।हमारे इलाके में पिछले 5-6 महीने से कोई बड़ी घटना घटित नहीं हुई थी। इसलिए लोग सामान्य से हो चले थे।एक दिन मेरे घनिष्ठ  मित्र पांडे जी का फोन आया। वह बनारस के रहने वाले थे और मेरी फैक्ट्री में पर्सनल मैनेजर थे। उन्होंने 6 माह पूर्व मेरी फैक्ट्री से लगभग 8 किलोमीटर दूर इंडस्ट्रियल एक्रेलिक कंपनी जो पॉलिएस्टर धागे बनाती थी एक मल्टीनेशनल कंपनी थी। पांडे जी ने उस कंपनी को ज्वाइन किया था। मेरा सपरिवार उनके पास आना जाना था ।  वह काफी घबराए हुए थे । उग्रवादियों के एक  दल द्वारा घुसकर उनकी कालोनी में निर्माणाधीन यूनिट में काम करने के लिए आए हुए दक्षिण भारत के लगभग 21 इंजीनियरों की जो इस प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे एक लाइन में खड़ा करके  गोली से उड़ा दिया था।स्थिति सामान्य होने के  दो दिन बाद  मैं उनके घर में गया मिलने के लिए। उन्होंने बताया कि दो उग्रवादी आपस में कॉलोनी के बीच स्थित पार्क में बुरी तरह लड़ रहे थे और एक आदमी सहायता के लिए चिल्ला रहा था जिसकी आवाज सुनकर कॉलोनी के लोग जिज्ञासा वश नीचे उतरने लगे और काफी बड़ी संख्या में सपरिवार लोग नीचे आ गए।पांडे जी स्वयं नीचे जाने के लिए उठे तभी उनकी पत्नी ने उन्हें नीचे जाने से रोक दिया क्योंकि उन्होंने देखा की काफी बड़ी संख्या में भीड़ इकट्ठी हो जाने के बाद वह दोनों आदमी लड़ना छोड़कर लोगों से कुछ कह रहे थे और कुछ हथियार बंद लोग और आ गए थे। खिड़की से  देखकर उनकी पत्नी  ने स्थिति की गंभीरता को भापकर  पांडे जी को वहीं  रोक दिया। पांडे जी ने बताया कि  तुरंत बाथरूम में घुसकर अंदर से  कुंडी लगा ली। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार नीचे उतरने के बाद कुछ और आतंकवादी दीवार फांद कर अंदर आ गए और उन्होंने सारे हिंदुओं को अलग एक लाइन में खड़ा होने को कहा । कुछ लोगों ने अपनी पहचान मुसलमान और क्रिश्चियन के रूप में दिया जिनको छोड़ दिया गया और कुछ लोगों ने पंजाबी बोलकर अपनी पहचान गैर सिख होने की दी वह भी बच गए। बाकी बचे हुए  हिंदुओं जिसमें अधिकांशतः इसमें  बाहर के इंजीनियर थे उन्हें एक लाइन में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया। लगभग 21 इंजीनियरों की निर्मल हत्या की गई। इस  घटना का उद्देश्य पूरे प्रदेश में विकास कार्य को ठप करना और आतंक फैलाना था। घटनास्थल में 4 दिन बाद भी सफाई हो चुकी थी लेकिन फिर भी मिट्टी और दीवारों में खून के दाग स्पष्ट नजर आ रहे थे। पांडे जी के साथ उस जगह को देखकर और घटना की कल्पना मात्र से ही हम लोग कई दिन तक दहशत रहे ।मैं एक दिन प्लांट में कुछ  टेक्निकल फाल्ट हो जाने की वजह से रुका हुआ था। मेरा सिख कर्मचारी जो  इलेक्ट्रीशियन था और पास के गांव से आता था उसका भाई गांव के गुरुद्वारे में ग्रंथी था। मेरी बहुत इज्जत करता था। वह मेरे पास में आकर धीरे से बोला बाबूजी ज्यादा देर तक मत रुका करो। आप टाइम से निकल जाया करें या आप बोले मैं  साथ में चला करूंगा। मैंने उसकी बात को  गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन मैंने हां करके सहमति दे दी।लगभग एक सप्ताह बाद बरनाला के पास एक आई कैंप लायंस क्लब द्वारा लगाया गया था।  मैं वह कैंप को अटेंड करने के बाद वापस आ रहा था। बरनाला हमारे कस्बे से लगभग 40 किलोमीटर दूर था। कैंप खत्म होने के बाद  मैं अपनी गाड़ी से वापस आ रहा था। मैं अपने एक मित्र को रास्ते में उतारकर गंतव्य की ओर बढ़ रहा था क्योंकि वहां से मेरा घर केवल 10 किलोमीटर दूर था। कुछ दूर जाने के बाद मैं  एक कंबल ओढ़े हुए सिख को हाथ देकर रुकने को बोलते हुए देखा। दिसंबर का महीना था और ठंड की शुरुआत हो चुकी थी। समय 5:30 होगा लेकिन सर्दी जी की वजह से अंधेरा हो चला था। मैंने गाड़ी रोक दी उसने मुझ से लिफ्ट मांगने का इशारा किया। सर्दियों में अधिकांशत स्थानीय लोग कंबल ओढ़ के ही घूमते हैं। मेरी कार के शीशे में लायंस  क्लब का स्टीकर लगा हुआ था।मेरे साथ वाली सीट पर बैठते हुए कर में लगे स्टीकर की ओर इशारा करते हुए  बोला "बाबूजी आप लोग ही हम लोगों के गांव में कैंप लगाते हैं"।मैंने संक्षिप्त में आज हुए कैंप के बारे में उसको बताया। आप लोग गुरु की सेवा कर रहे हैं पंजाब में यह बहुत अच्छा है। 15 मिनट के बाद मुझे उसने एक जगह पर रुकने का इशारा किया। कार से उतरते समय स्वभावतया  मेरी नजर कंबल के अंदर निकली हुई एक-47 की नाल की नोक पर  चली गई जो उतरते समय मुझे दिख गई थी। मुझे ठंड में भी  पसीना आ गया लेकिन मैंने सहज होने का अभिनय किया। वह बोला बाबूजी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आपके यहां कोई भी दिक्कत आए तो आप बोल देना ( मैं मन्ना दा बंदा हां) या यानी मैं मन्ना का आदमी हूं।  उसने मुझे हाथ जोड़कर “सत श्री अकाल” किया और सड़क के नीचे जा रही पगडंडी में उतर गया। जाते-जाते मैंने देखा पास वाले नाले के पास तीन-चार लोग कंबल ओढ़ कर और  खड़े थे।मैं गाड़ी चलाकर कैसे घर पहुंचा मुझे याद नहीं।मैंने जीवन में पहली बार एक सिख आतंकवादी को जो बिल्कुल एक आम इंसान की तरह था अपनी आंखों से देखा।पंजाब से मेरा बहुत ही गहरा संबंध रहा कुछ मित्र आज भी मेरे पास आते जाते हैं और मैं साल में एक बार पंजाब जरूर जाता हूं।लेखक-प्रेम मोहन तिवारी" प्रेम ब्रिज"

1971 में नागरिक सुरक्षा समिति द्वारा वालंटियर के रूप में कार्य करने पर समिति द्वारा प्रशस्ति पत्र दिया गया।

*ऊपरके के चित्र में लायंस क्लब इंटरनेशनल के प्रेसिडेंट के रूप में लगाया गया ब्लड डोनेशन कैंप में तत्कालीन मुख्यमंत्री पंजाब द्वारा शिविर का उद्घाटन किया गया