एक कुँआरे की आत्मकथा
मैं अपने परिचय के दौरान एक चीज क उल्लेख नहीं कर पाया 90 के दशक में मैं लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 F संगरूर पंजाब का सदस्य बना. इस इंटरनेशनल. संस्था से मैं लगभग 10 साल तक जुड़ा रहा. इन 10 सालों में मैं 1994 -95 में सेक्रेटरी के पद तक पहुंचा और बाद में प्रेसिडेंट भी बना. हम लोग बहुत से सामाजिक कार्य करते थे. दूरदराज के गांव में हम लोग जैसे ब्लड डोनेशन कैंप, मेडिकल चेकअप कैंप इत्यादि आसपास के और दूरदराज के गांव में कराते थे. महीने में एक बार मीटिंग होती थी इसमे महीने की प्रोग्रेस रिपोर्ट के बाद में सभी लोग डिनर और बीच में हल्के फुल्के मनोरंजक कार्यक्रम करते थे. मेरी यह कविता” एक कुआंरे की आत्मकथा” उस कार्यक्रम की शोभा बनती थी और लोग डिमांड करते थे. यह हास्य कविता मैं आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूं l
मैं सीधा-साधा प्राणी था,
अपनी दुनिया में रहता था.
राजश्री से श्रीदेवी तक
सबको मैं अपनी कहता था.
सोने जैसे दिन होते थे
और चांदी जैसी थी रातें
हर देख कुंवारी लड़की को
हम इश्क का कलमा फरमाते.
कई बार इडियट नॉनसेंस
सुन कर के ही बस छूट गया.
एक बार सरे बाजार में मिल कर
सब ने मुझको पीट दिया.
हम प्यार की कसमें खाते थे
फिर भी पिट कर घर आते थे.
कुछ मित्रों रिश्तेदारों ने
था मुझको ऐसा बहकाया.
एक बेलन धारीनारी को
था मेरी बीबी बनवाया.
बीबी तो अच्छी खासी थी
जो कहता था वह करती थी,
पर बात बात में भाई वह
बेलन संचालन करती थी. मैं
शूरवीर मैं कर्मवीर मैं.
हर दुख हो सकता था.
पर मार के आगे भूत भगे तो मैं,
कैसे रुक सकता था.
अब पीले पीले दिन होते,
और काली काली थी रातें
हर देख विवाहित स्त्री को , हम अंदर
तक थे थर्राते.
बीबी और रासन चीनी के
उल्टे चक्कर में जब आया
अनुशासन के अंदर रहकर
शासन का भेद समझ पाया.
यह दोष है सारा पतिओं का
हर जुल्म को सहते जाते हैं.
यह घर में धक्के खाते हैं
पर महिला वर्ष मनाते हैं.
तुम ईस्टर हो या मिस्टर हो
या कोई बड़े मिनिस्टर हो,
अपनी बीवी के आगे तुम
लगते पूरे घनचक्कर हो.
चूल्हा चौका बर्तन जैसी
मुझसे बेगार नहीं होगी.
मेरे छोटे से घर में अब
नारी सरकार नहीं होगी.
इस जग में सुख से जीने का
कुछ तो अधिकार हमारा है.
हर जोर जुल्म की टक्कर में
हड़ताल हमारा नारा है.